कबीर, निरगुण सरगुण दवन्द पसारा ।
दोनो पड़ गऐ काल की धारा ।।
दादू, कोई निरगुण मे रीझ रहा,
कोई सरगुण ठहराऐ ।
दादू चाल कबीर की,
मोसे कही न जाऐ ।।
Wednesday, 21 September 2022
देही ज्ञान सब जगत बखाने
कबीर, देही ज्ञान सब जगत बखाने,
विदेही ज्ञान कोई बिरला जाने ।
ध्यान विदेह और नाम विदेहा,
दोऊ लख पावै मिटे संदेहा ।।
विदेही ज्ञान कोई बिरला जाने ।
ध्यान विदेह और नाम विदेहा,
दोऊ लख पावै मिटे संदेहा ।।
देखा देखी गुरमुख हो गऐ
कबीर, देखा देखी गुरमुख हो गऐ,
किया न तत्व विचारा ।
गुरू शिष्य दोनो के सिर पे,
काल ठोके पंजारा ।।
किया न तत्व विचारा ।
गुरू शिष्य दोनो के सिर पे,
काल ठोके पंजारा ।।
Saturday, 19 February 2022
सत का सबदु कबीरा कहै
- SGGS 343
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Wednesday, 3 November 2021
अजहूँ सो पहला दिन
कबीर, कहत सुनत सब दिन गए,
उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं,
कही कबीर चेत्या नहीं,
अजहूँ सो पहला दिन।।
हम तौ एक एक करि जाना
कबीर, हम तौ एक एक करि जाना।
दोइ कहैं तिनहीं कौ दोजग जिन नाहिंन पहिचाना ।।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समाना।
एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा साना।।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।
माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबाना।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।।
दोइ कहैं तिनहीं कौ दोजग जिन नाहिंन पहिचाना ।।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समाना।
एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा साना।।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।
माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबाना।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।।
संतो देखा जग बौराना
कबीर, संतो देखत जग बौराना।
साँच कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै असनाना।
आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना।।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़ै कितेब कुराना।
कै मुरीद तदबीर बतावैं, उनमें उहै जो ज्ञाना।।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना।।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।
हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना।।
घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अंत काल पछिताना।
कहै कबीर सुनो हो संतो, ई सब भर्म भुलाना।
केतिक कहौं कहा नहिं मानै, सहजै सहज समाना ।।
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