यह एक बहुत ही गहरा और विचारणीय आध्यात्मिक प्रश्न है। कबीरदास जी की वाणी को गहराई से समझने के लिए हमें 'बावन अक्षरों' (सांसारिक ज्ञान) और 'अविनाशी ओम' (परम सत्य) के अंतर को समझना होगा।
सीधा उत्तर यह है कि कबीर जी ने सांसारिक या ऊपरी तौर पर रटे जाने वाले 'ओम' (जो बावन अक्षरों की सीमा में आता है) का निषेध किया है, लेकिन उन्होंने उस 'सच्चे ओम' (अनहद नाद या शब्द) को जपने (अनुभव करने) को कहा है जो इन अक्षरों से परे है।
इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से आसानी से समझ सकते हैं:
1. बावन अक्षर और ओम का भ्रम
कबीर जी कहते हैं कि हमारी वर्णमाला के 52 अक्षर (बावन अक्षरा) नाशवान हैं। इसी वर्णमाला से मिलकर 'ओ-उ-म' (ओम्) शब्द बनता है जिसे लोग मुंह से बोलते हैं।
- कबीर की चेतावनी: मुंह से बोला जाने वाला यह नाम माया के दायरे (त्रिकुटी या काल चक्र) में आता है और एक दिन नष्ट हो जाता है।
- कबीर की साखी: "बावन अच्छर लोक त्रय, सब कुछ इनहीं माहि। ये अच्छर खिारी जाहिगे, वो अच्छर इन मह नाहि॥" (अर्थात: तीनों लोक बावन अक्षरों में समाए हैं और ये सब नष्ट हो जाएंगे, लेकिन वह सच्चा परमात्मा इन अक्षरों में नहीं है।)
2. कबीर का 'ओम' या 'नाम' क्या है?
जब कबीर जी नाम सुमिरन या ओम की बात करते हैं, तो उनका मतलब किसी ध्वनि को मुंह से बार-बार दोहराना (जप) नहीं है।
- अजपा जप: कबीर जी 'अजपा जप' की बात करते हैं, जो बिना जीभ हिलाए, सांसों के माध्यम से भीतर होता है।
- अनहद नाद: यह वह शाश्वत ध्वनि (ध्वनि रहित ध्वनि) है जो सृष्टि के कण-कण में गूंज रही है। इसे ही 'सत्य नाम' या 'धुनात्मक नाम' कहा जाता है।
3. कथनी और करनी का अंतर
कबीर जी ने उन लोगों पर कटाक्ष किया है जो केवल ऊपरी तौर पर "ओम-ओम" या "राम-राम" रटते हैं, लेकिन उनके भीतर कोई बदलाव नहीं आता:
- "कबीर राम कहन में भेद है, ताकरु चित विचार। एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में लेटा॥"
इसी तरह, जो ओम बावन अक्षर में आता है, वह केवल बोलने का साधन है। लेकिन जो ओम (परम सत्ता) घट-घट में व्याप्त है, कबीर जी उसी को जानने और उसमें लीन होने की बात करते हैं।
निष्कर्ष: कबीर जी ने अक्षर रूपी 'ओम' को छोड़ने को कहा है क्योंकि वह माया का हिस्सा है, और नाद रूपी (आध्यात्मिक) 'ओम' को पकड़ने को कहा है जो मोक्ष का द्वार है।
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