संत कबीरदास के अनुसार प्राण साधना (या श्वास साधना) हठयोग की जटिल क्रियाओं के बजाय 'सहज सांसों के सुमिरन' और 'अजपा जाप' पर आधारित है। कबीरदास जी ने नाथपंथियों और सिद्धों से प्राणायाम, नाड़ी शुद्धि (इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना) और कुंडलिनी चक्रों का ज्ञान तो लिया, लेकिन उन्होंने कठोर शारीरिक हठयोग का खंडन किया और मानसिक व आंतरिक साधना को अपनाया। [1, 2, 3, 4]
कबीर के अनुसार प्राण साधना को निम्नलिखित तरीकों से किया जाता है:
1. श्वास-उच्छ्वास का सुमिरन (सांसों की माला)
कबीर के अनुसार, ईश्वर को बाहर ढूँढने की जगह अपनी हर आती-जाती सांस (प्राण) में परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। वे कहते हैं: [1]
"माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।"
यहाँ 'मन का मनका' आपकी सांसें हैं। सांस लेते और छोड़ते समय पूरे होश (Awareness) के साथ परमात्मा का नाम जपना ही प्राण साधना है। [1]
2. अजपा जाप ('सोऽहम्' साधना)
प्राण साधना का सबसे मुख्य रूप 'सोऽहम्' (So-Ham) का जाप है, जिसे 'अजपा जाप' भी कहते हैं। [1]
- विधि: जब हम सांस अंदर खींचते हैं, तो प्राकृतिक रूप से 'सो' (So) की ध्वनि होती है, और जब सांस बाहर छोड़ते हैं, तो 'हम्' (Ham) की ध्वनि निकलती है। [1]
- कबीर का मानना है कि मनुष्य को बिना जीभ हिलाए, स्वाभाविक रूप से चल रही इस श्वास-प्रक्रिया के साथ आंतरिक तालमेल बिठाना चाहिए। [1]
3. सुरति और निरति का योग
प्राण साधना तब सफल होती है जब 'सुरति' (ध्यान या चेतना) और 'निरति' (सांसारिक विकारों से विरक्ति) का मिलाप होता है। अपनी सुरति को सांसों की गति पर टिका देने से मन शांत होता है और प्राण व मन दोनों एक बिंदु पर स्थिर हो जाते हैं।
4. इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संतुलन
कबीर ने योगियों की शब्दावली का उपयोग करते हुए बताया है कि प्राण वायु को संतुलित कैसे करना है:
- इड़ा (बाईं नासिका - चंद्र स्वर) और पिंगला (दाईं नासिका - सूर्य स्वर) के प्रवाह को साधना के माध्यम से संतुलित किया जाता है। [1, 2]
- जब दोनों सुर (सांसें) बराबर चलने लगती हैं, तब प्राण ऊर्जा मध्य नाड़ी सुषुम्ना में प्रवेश करती है, जिसे कबीर 'त्रिवेणी' या 'अन्तःस्थल' भी कहते हैं। इसी अवस्था में साधक को ब्रह्मांडीय आनंद या 'अनहद नाद' सुनाई देता है। [1]
5. सहज समाधि
कबीर की प्राण साधना का अंतिम लक्ष्य कठोर समाधि नहीं, बल्कि सहज समाधि है। जहाँ उठते-बैठते, काम करते हुए भी साधक के प्राण और ध्यान हर पल परमात्मा से जुड़े रहते हैं।
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