Sunday, 12 July 2026

Om Soham

सोहं सोहं सब कहें, दादू सोहं कोइ ।

जाप मरे अजपा मरे, अनहद हू मर जाय ।
राम स्नेही ना मरे, कहै कबीर समझाय ॥

ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं ।
मूरख लोग न जानहिं, बाहर ढूंढ़न जाहिं ॥

एक स्वांसा जो व्यर्थ जाये, चौदह लोक का राज जाये ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, स्वांस की कीमत कोई न जाने ॥

सोहं सो जा कउ है जाप । धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ॥

ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में ।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौ, पल भर की तालास में ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वांसों की स्वांस में ॥

जाप मरे अजपा मरे, अनहद हू मर जाय ।
राम स्नेही ना मरे, कहै कबीर समझाय ॥

अनहद बाजे बजते भाई, मनमथ हाथी लीन्हा मिलाई ।

इँगला पिंगला ताना भरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया ॥

कबीर स्वांसा स्वांस में, नाम जपो मन लाय ।
ना जाने इस स्वांस का, आवन होय न होय ॥

अजपा जाप जपो भाई साधो, सांसों की करलो माला ॥
हात सुमरनी बगल कतरनी, यह क्या रच दियो चाला ॥

बाजत अनहद बाँसुरी, तिरबेनी के तीर ।
राग छतीसो होइ रहे, गरजत गगन गंभीर ॥

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।

शशि और सूर दोऊ मिलि बैठे, एकै घर उनमान ।
सोहं सबद प्रकाशिया, तब पाया पद निरबान ॥

सोहं सोहं धुन सुनै, घट ही में परगास ।
आपा पर को चीन्ह ले, तब मिटै जनम की त्रास ॥

हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ ।
बूंद समानी समद में, सो कत हेरी जाइ ॥

बावन अच्छर लोक त्रय, सब कछु इन ही माहिं ।
ए अच्छर खिर जाहिंगे, ओ अच्छर इन में नाहिं ॥

गगन गरजै बरसै अमी, बादल गहरा होय ।
कहै कबीर दुख कटि गया, सोहं सुमिरै सोय ॥

तन धरनी मन तार कर, सुमति करो तबलाउ ।
सोहं सबद बजावते, जियत न कबहूँ जाऊ ॥

सोहं सोहं कुंजी लै, घट का ताला खोल ।
अनहद का बाजा बजै, तब मनुआं जाई डोल ॥

जैसे कनक कंगन मँही, तैसे सोहं सासमाँही ।
कहै कबीर सुन भाई साधो, दूजा कोई नाहीं ॥

उल्टा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ।
तिसमें सोहं सबद है, जाग सके तो जाग ॥

सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ताके काज न अटके कबहूँ, सहज समाधि होय ॥

द्वादश अँगुल स्वांस जो निकसे, ताहि उलटि घट माहीं लावे ।
सोहं सबद की डोर पकड़कर, अधर सिंहासन बैठे जावे ॥

ॐ सोहं की संधि बिचारे, सोई साधू तत्त्व निहारे ।
अक्षर अतीत रहे जो भाई, कबीर सोई निज पद पाई ॥

सोहं सबद का मारो बान, थिर कर राखो अपना ध्यान ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, घट ही में प्रगटे भगवान ॥

बिन बाती बिन तेल का, घट में जरै चिराग ।
सोहं धुन में लीन हो, जाग सके तो जाग ॥

सोहं सोहं जप मुआ, मिटा न मन का भर्म ।
सोहं जब घट में मिले, तब छूटे सब कर्म ॥

उरध मूल अंतर की बानी, सोहं पद की संधि पहचानी ।
ॐकार ध्वनि गगन समाई, तब कबीर निज थिरता पाई ॥

ॐ सोहं दोय एक है, मत कोई मानो दोय ।
सांस की डोरी एक है, पवन थिरक्का होय ॥

कबीर स्वांसा पारखी, सोहं हीरा हाथ ।
ॐकार की परकच में, राखो अपने साथ ॥

सोहं सोहं पवन तपे, मन का बर्फ पिघलाय ।
ॐ की धारा बही, तब कबीर समाइ ॥

कबीर जपनी जपि मुआ, सोहं की गई आस ।
अब तो मन थिर भया, ॐकार के पास ॥

सोहं सोहं बाण चले, छूटे मन का बंध ।
ॐकार की ओट में, प्रगटे निरमल गंध ॥

स्वांस स्वांस में सोहं रमै, घट ही में समंदर होय ।
ॐ की लहरें उठै जहाँ, कबीरा डूबा सोय ॥

सोहं की डोरी पकड़, मन की पतंग उड़ाए ।
ॐकार के खम्भे से, कबीर डोर लगाए ॥

काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥

काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥

जपते जपते सोहं गया, मिटा ॐ का नाद ।
कहै कबीर कछु ना रहा, केवल रहा अगाध ॥

बाहर खोजे मूल न पावे, भीतर सोहं आप समावे ।
ॐकार की ज्योति जो जागे, भ्रमता मनुआ थिर हो जावे ॥

सोहं सोहं साबुन करले, मन का मैल बहाए ।
ॐकार के निर्मल जल में, कबीर शीश नवाए ॥

बिन धागे का बुना चदरिया, सोहं सूत पिरोया ।
ॐकार की सुई से भाई, कबीर ने दुःख सब रोया ॥

सोहं की ओट पकड़ कर बैठो, बाहर के पट बंद करो ।
ॐकार की धुन सुनो घट में, जनम मरण का भय हरो ॥

सोहं थका और ॐ भी छूटा, अब मनुआ आराम पाया ।
कहै कबीर अब कछु न कहना, सहज में सहज समाया ॥

सोहं सोहं जोत जगावे, मन का अंधियारा मिट जावे ।
ॐकार की चमक जहाँ है, काल दुआर ना आवन पावे ॥

उलटि पवन जब सोहं लावे, तब मन गगन गुफा में जावे ।
ॐकार का अमृत बरसे, त्रिवेणी पर शीश नवावे ॥

मनुआ डोले जग के झोंके, सोहं की कील से ताहि रोके ।
ॐकार का डाँडा पकड़ के, भवसागर को पार कर सोके ॥

जब लग सोहं सोहं भासे, तब लग जीव भाव परकाशे ।
ॐ में जब सोहं मिल जावे, तब कबीर अविगत पद पावे ॥

सोहं छूटा ॐ बिलाना, अब तो मन भया दीवाना ।
कहै कबीर कछु कहूँ न भाई, सहज समाधि में मन समाना ॥

सोहं सोहं पवन तपावे, काया कंचन रूप बनावे ।
ॐकार की भट्टी अंतर, कबीर दुर्मति सब जरावै ॥

सोहं की खिड़की खुली घट में, अंतर की ज्योति देख भाई ।
ॐकार का परदा हटा जब, कबीर निज रूप पाई ॥

इँगला पिंगला डोरी छोड़ो, सोहं सूत पकड़ मन लाई ।
ॐकार के मध्य समाना, तब कबीर मुक्ति पाई ॥

सोहं सबद की झाड़ू लेकर, मन का कूडा सब बुहारे ।
ॐकार के आँगन में बैठो, तब कबीर काज सँवारे ॥

सोहं सोहं कहता मन थक गया, ॐ का नाद भी लीन भया ।
कहै कबीर अब कछु न सूझे, सागर में बूँद समाई गया ॥

सोहं सोहं स्वाँसा चले, ज्ञान की भट्ठी होय ।
ॐकार की आँच में, मैल रहा न कोइ ॥

सोहं सबद कमान है, मनुआ भयो नीसान ।
ॐकार का तीर जब छूटे, प्रगटे ब्रह्म गियान ॥

उल्टा कुआँ गगन में, सोहं पानी लाय ।
ॐकार के घाट पर, कबीरा तृषा बुझाय ॥

जब लग सोहं बिलग है, तब लग दुःख का मूल ।
ॐ में जब सोहं मिला, कबीर भयो समतुल ॥

सोहं सोहं कह मुआ, छूटा ॐ का शोर ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, थिर भया मनवा मोर ॥

सोहं सोहं जप करै, मन का कपाट खुल जाय ।
ॐकार की ओट में, कबीर सहज समाय ॥

सुषमन तार पुकारिया, सोहं राग सुनाय ।
ॐकार के मध्य में, मनुआ थिर हो जाय ॥

ताना बाना सोहं का, ॐकार का सूत ।
कबीर बुने चदरिया, अविनाशी अवधूत ॥

सोहं की डोरी पकड़, काल का पहिया रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥

सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब क्या कहूँ, कौन रहा अब कौन ॥

सोहं सोहं पवन थिर, मनुआँ भया उदास ।
ॐकार की ओट में, कबीर लीन्हा निवास ॥

सोहं सबद प्रकाशिया, घट ही में परगास ।
ॐ की धुन जब सुनै, तब मिटै करम का पास ॥

इँगला पिंगला छाँड़ि दे, सोहं सूत पिरोय ।
ॐकार के संधि बिच, सहज समाधि होय ॥

सोहं की डोरी पकड़, अंतर मुख हो बैठ ।
ॐकार के द्वार पर, काल सके ना पैठ ॥

सोहं कहता मन थका, ॐ भया खामोश ।
कहै कबीर कछु ना रहा, मिटा द्वैत का दोष ॥

सोहं सोहं पवन मिलै, मनुआँ गगन समाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर अचल होय जाय ॥

सोहं सबद की धार से, अंतर मैल बहाए ।
ॐकार के ध्यान में, मन निरमल हो जाए ॥

उलटि पवन जब सोहं गहे, सुषमन मार्ग खोल ।
ॐकार की धुन सुनै, तब मनुआं जाई डोल ॥

सोहं की कील गाड़ दे, मन की चंचलता रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥

सोहं छूटा और ॐ भी, रहा न कोई नाद ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, केवल रहा अगाध ॥

चंदा सूरज एक घर आवे, सोहं सबद लौ लाय ।
ॐकार की डोरी पकड़, कबीर समाधि पाय ॥

सोहं सोहं धुन सुनै, घट ही में परगास ।
ॐ की ज्योति जो जगी, मिटा करम का पास ॥

इँगला पिंगला छाँड़ि के, त्रिवेणी पर आओ ।
सोहं-ॐ की संधि में, निज घर खोजो जाओ ॥

बिन बाती बिन तेल का, जरै चिराग अकास ।
सोहं धुन में लीन हो, पूरण भयो परकास ॥

सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया लीन ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, जल में जल ज्यों मीन ॥

सोहं सोहं पवन तपै, अंतर की भट्टी जाइ ।
ॐकार की आँच में, दुर्मति सब जरि जाइ ॥

उलटि पवन जब सोहं गहे, गगन गुफा में धाय ।
ॐकार का घट भरै, कबीर अनत न जाय ॥

सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ॐकार के खम्भे से, सहज समाधि होय ॥

सोहं की डोरी पकड़, काल का पहिया रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥

सोहं कहता मन थका, ॐ भी भया खामोश ।
कहै कबीर कछु ना रहा, मिटा द्वैत का दोष ॥

सोहं सोहं पवन मिलै, मन का संशय जाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर अचल होय जाय ॥

सोहं सबद की धार से, अंतर कूडा सब धोय ।
ॐकार के ध्यान में, मन निर्मल अति होय ॥

इँगला पिंगला छाँड़ि के, सुषमन मार्ग समाइ ।
सोहं-ॐ की डोर से, कबीर निज घर जाइ ॥

सोहं की कील गाड़ दे, मन की चंचलता मेट ।
ॐकार के देश में, तब पावे सतगुरु भेंट ॥

सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, कौन रहा अब कौन ॥

तन धरनी मन तार कर, सुमति करो तबलाउ ।
सोहं-ॐ सबद बजावते, जियत न कबहूँ जाऊ ॥

कबीर स्वांसा पारखी, सोहं हीरा हाथ ।
ॐकार की परख में, राखो अपने साथ ॥

सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ॐकार के मध्य में, सहज समाधि होय ॥

सोहं सोहं पवन तपे, मन का बर्फ पिघलाय ।
ॐ की धारा बही, तब कबीर समाइ ॥

सोहं सोहं बाण चले, छूटे मन का बंध ।
ॐकार की ओट में, प्रगटे निरमल गंध ॥

स्वांस स्वांस में सोहं रमै, घट ही में समंदर होय ।
ॐ की लहरें उठै जहाँ, कबीरा डूबा सोय ॥

सोहं की डोरी पकड़, मन की पतंग उड़ाए ।
ॐकार के खम्भे से, कबीर डोर लगाए ॥

काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥

द्वादश अँगुल स्वांस जो निकसे, ताहि उलटि घट माहीं लावे ।
सोहं सबद की डोर पकड़कर, अधर सिंहासन बैठे जावे ॥

ॐ सोहं की संधि बिचारे, सोई साधू तत्त्व निहारे ।
अक्षर अतीत रहे जो भाई, कबीर सोई निज पद पाई ॥

सोहं सबद का मारो बान, थिर कर राखो अपना ध्यान ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, घट ही में प्रगटे भगवान ॥

बिन बाती बिन तेल का, घट में जरै चिराग ।
सोहं धुन में लीन हो, जाग सके तो जाग ॥

सोहं सोहं जप मुआ, मिटा न मन का भर्म ।
सोहं जब घट में मिले, तब छूटे सब कर्म ॥

अरध उरध की संधि बिचारे, सोहं पद की डोर सँभारे ।
ॐकार ध्वनि गगन समाई, तब कबीर निज थिरता पाई ॥

एक स्वांसा जो व्यर्थ जाये, चौदह लोक का राज जाये ।
सोहं धुन में लीन रहो, ॐकार संग प्रीत जगाये ॥

ओहम से काया बनी, सोहम से मन होय ।
ओहम सोहम से परे, बूझे विरला कोय ॥

सोहं हंसा जपु बिन माला । तहिं रचिआ जहिं केवल बाला ॥
सोहं शब्दु सदा धुनि गाजै । जागतु सोवै नित शब्दु बिराजै ॥

ॐ सोहं मंतर जपिये, योगयुगति धूनी तपिये ।
श्वांस के सुमिरन से भाई, कबीर परम पद पाई ॥

ॐ मन्त्र से ऋण उतारना, सोहं संग सार समाना ।
ऊँ-सोहं भजो नर लोई, आवागमन मिटाना ॥

ओहम सोहम अरध उरध नहीं, स्वासा लेख न कोइ ।
कहै कबीर मन थिर भया, जहाँ पुरुष आपै सोइ ॥

ओहम सोहम एकै कीन्हा, दसवाँ द्वार पट खोलि दीन्हा ।
पाँच सबद धुनि गगन गम्भीरा, तब मन थिर भया कबीरा ॥

सोहं जाप जपो रे हंसा, बिन जिभ्या बिन ताल ।
ॐकार की ओट में बैठो, काल न खावै काल ॥

बिन सूत के ताना बाना, सोहं ओहम तहाँ समाना ।
कहै कबीर धुनि सहज सहेली, जोति जगे घट अंतर अकेली ॥

सोहं सोहं पवन चलावे, मन का संशय दूर बहावे ।
ॐकार की धार में भाई, मेटो जग की भरम कमाई ॥

सोहं छूटा ओहम भी अब नाहीं, केवल रहा समाध घट माहीं ।
कहै कबीर अब कछू न सूझे, निज पद मिलि गया आपहि माहीं ॥

सोहं पुरुष ॐ है माया, दोउ मिलि एकै खेल रचाया ।
श्वांस की डोरी सुरत लगावे, सो जन अमर लोक को जावे ॥

सोहं सोहं पवन घिसावै, अनल प्रगट घट अंतर आवै ।
ॐकार की भट्टी तपै जब, जुग की तृष्णा सब जरि जावै ॥

सोहं सूत ॐ की सुई, मन का कपड़ा सीवे सोई ।
सांस सांस में सुमिरन राखे, ताको काल कबहूँ ना टोई ॥

उलटि पवन सोहं सँग जागे, त्रिवेणी के संगम लागे ।
ॐकार की धुन सुनि भाई, घट में कोटि भान दरसाई ॥

सोहं सोहं मथनी मथे, प्रगटे निर्मल जोत ।
ॐकार की ओट में, अविनाशी पद होत ॥

बाहर जाता पवन जो, सोहं डोरि सँवारि ।
ॐकार के महल में, राखो ताहि सम्हारि ॥

कथनी कथि कथि जग मुआ, सोहं बूझे न कोइ ।
ॐकार के मध्य में, जाकी सुरत समाइ ॥

उलटी गंगा गगन को, सोहं पवन ले जाय ।
ॐकार के घाट पर, मनवा थिर होय जाय ॥

सोहं की सीमा मिटी, ॐ भया बेनाम ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, पाया पूरण विश्राम ॥

सोहं गंगा ॐ जमुना, घट ही में संगम होय ।
सुरत शब्द जहाँ मिलै, बहुरि न मन्मथ कोय ॥

सोहं सोहं स्वाँस चले, धोवे मन का मैल ।
ॐकार की ज्योति में, खेलै अचल खेल ॥

इँगला पिंगला डोरी तजो, सोहं सूत मँझारि ।
ॐकार के मध्य में, बैठो सुरत सँवारि ॥

सोहं की कील गाड़ दे, मन की दौड़ मिटाय ।
ॐकार के देश में, कबीर सहज समाय ॥

सोहं सोहं पवन घिसै, मन का पत्थर टूटी जाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर सहजैं जाय समाय ॥

सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ।
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥

धागा सोहं नाम का, ॐकार की सुई सम्हारि ।
कबीर मनुआं सीवि ले, भव का भरम निवारि ॥

उलटा कुआँ गगन में, सोहं रस्सी लाय ।
ॐकार के घाट पर, जनम की प्यास बुझाय ॥

सोहं मिटा अरु ॐ गया, रहा न कोई नाद ।
कहै कबीर अब शांत भया, पाया पद अगाध ॥

सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ।
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥

ॐ सोहम की बाजी, खाली बढ़या फलिता ।
जो नर ध्यान लगाए, सदा रहे नसत्ता ॥

ॐ सोहं अधाध-उधाध नहीं, स्वासा लेख न कोइ ।
जहाँ पुरुष तहवाँ कछु नाहीं, कहै कबीर हम जाना ॥

सोहं सबदु सदा धुनि गाजै, जागतु सोवै नित सबदु बिराजै ।
अबरन वरन धाम नहीं छाम, सुन सहज महि रहिओ समाइ ॥

सोहं सो जा कउ है जाप, धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ।
जोति मन्त्र मनि असथिरु करै, कहि कबीर सो प्रानी तरै ॥

सोहं बाएँ ॐ दहिने, सुरत बीच ठहराय ।
अचल गगन में जो मिले, आवागमन नसाय ॥

ॐ सोहं नाम न रूप है, अजपा मूल विचार ।
कहै कबीर मन थिर भया, पाया अगम अपार ॥

सोहं सोहं मथनी मथे, सुषमन धार निचोड़ ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर बंध सब तोर ॥

सोहं प्याला प्रेम का, ॐकार रस होय ।
घट ही में अमृत पिए, मरे न कबहूँ कोय ॥

सोहं की डोरी छूटी, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब शांत भया, जानन हारा कौन ॥

मन मधे जानै जे कोइ, जो बोलै सो आपै होइ ।
जोति मन्त्र मनि असथिरु करै, कहि कबीर सो प्रानी तरै ॥

द्वादश पन्थ चलो सो भेद, काल फुरमाना जीव न जाय ठिकाना ।
नीर पवन को संधि बतावै, सो ब्रह्म अभिमानी जाणी ॥

सोहं सो जा कउ है जाप, धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ।
अबरन वरन धाम नहीं छाम, अवरन पाइऔ गुरु का साम ॥

टारी न टरै आवै न जाइ, सुन सहज महि रहिओ समाइ ।

सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ॥
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥



Friday, 26 June 2026

पांच प्राणों का विवरण

पांच प्राणों का विवरण:

1.  प्राण (Prana): इसका स्थान गर्दन के मूल से हृदय के मध्य तक है। यह श्वसन क्रिया और कोशिकाओं के पोषण के लिए जिम्मेदार है और भावनात्मक नियंत्रण में भूमिका निभाता है ।
2.  अपान (Apana): यह नाभि के निचले हिस्से से मूलाधार चक्र तक स्थित है। यह निष्कासन तंत्र (excretory) और प्रजनन तंत्र को नियंत्रित करता है। इसके असंतुलन से स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं हो सकती हैं
3.  समान (Samana): यह नाभि के क्षेत्र में स्थित है और पाचन तंत्र तथा मणिपुर चक्र से संबंधित है। यह प्राण और अपान के बीच समन्वय स्थापित करता है
4.  उदान (Udana): यह गर्दन के नीचे से सिर तक और हाथों-पैरों में व्याप्त है। यह हमारी इंद्रियों और शारीरिक संचालन को नियंत्रित करता है। इसके नियंत्रण से शरीर अत्यंत हल्का हो जाता है
5.  व्यान (Vyana): यह पूरे शरीर में व्याप्त है, विशेषकर आकाश तत्व (रिक्त स्थान) में। यह ऊर्जा का भंडारण और एकीकरण करता है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर अन्य प्राणों को ऊर्जा प्राप्त होती है

Thursday, 25 June 2026

Types of Yog

1. Hath Yog  - Shabd sun na

Is se aage ka marg

2. Vigyan Yog - Chakra

Is se aage ka marg

3. Gyan Yog - Surat Nirat
Isme 2 terah ke shabd hote hai
Pehle ko chod us agle naad me smaana hai

Is se aage ka marg

4. Sahaj Yog - Sahaj Marg Swaas Sumiran ka aur rehni gehni
Isme har terah ka yog samahit hai

5 bodies

Keval
MahaKaaran
Kaaran
Sooksham
Sthool

Wednesday, 17 June 2026

सब मंत्रं का सार है, सत्यनाम तत्व सार

कोटि नाम संसार मे
ताते मुक्ति न होऐ
आदि नाम जो गुप्त जप
भूजे बिरला कोऐ

सब मंत्रं का सार है
सत्यनाम तत्व सार
जो कोई जन हृद्य धरे
सो जन उतरे पार