सोहं सोहं सब कहें, दादू सोहं कोइ ।
जाप मरे अजपा मरे, अनहद हू मर जाय ।
राम स्नेही ना मरे, कहै कबीर समझाय ॥
ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं ।
मूरख लोग न जानहिं, बाहर ढूंढ़न जाहिं ॥
एक स्वांसा जो व्यर्थ जाये, चौदह लोक का राज जाये ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, स्वांस की कीमत कोई न जाने ॥
सोहं सो जा कउ है जाप । धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ॥
ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में ।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौ, पल भर की तालास में ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वांसों की स्वांस में ॥
जाप मरे अजपा मरे, अनहद हू मर जाय ।
राम स्नेही ना मरे, कहै कबीर समझाय ॥
अनहद बाजे बजते भाई, मनमथ हाथी लीन्हा मिलाई ।
इँगला पिंगला ताना भरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया ॥
कबीर स्वांसा स्वांस में, नाम जपो मन लाय ।
ना जाने इस स्वांस का, आवन होय न होय ॥
अजपा जाप जपो भाई साधो, सांसों की करलो माला ॥
हात सुमरनी बगल कतरनी, यह क्या रच दियो चाला ॥
बाजत अनहद बाँसुरी, तिरबेनी के तीर ।
राग छतीसो होइ रहे, गरजत गगन गंभीर ॥
घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।
शशि और सूर दोऊ मिलि बैठे, एकै घर उनमान ।
सोहं सबद प्रकाशिया, तब पाया पद निरबान ॥
सोहं सोहं धुन सुनै, घट ही में परगास ।
आपा पर को चीन्ह ले, तब मिटै जनम की त्रास ॥
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ ।
बूंद समानी समद में, सो कत हेरी जाइ ॥
बावन अच्छर लोक त्रय, सब कछु इन ही माहिं ।
ए अच्छर खिर जाहिंगे, ओ अच्छर इन में नाहिं ॥
गगन गरजै बरसै अमी, बादल गहरा होय ।
कहै कबीर दुख कटि गया, सोहं सुमिरै सोय ॥
तन धरनी मन तार कर, सुमति करो तबलाउ ।
सोहं सबद बजावते, जियत न कबहूँ जाऊ ॥
सोहं सोहं कुंजी लै, घट का ताला खोल ।
अनहद का बाजा बजै, तब मनुआं जाई डोल ॥
जैसे कनक कंगन मँही, तैसे सोहं सासमाँही ।
कहै कबीर सुन भाई साधो, दूजा कोई नाहीं ॥
उल्टा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ।
तिसमें सोहं सबद है, जाग सके तो जाग ॥
सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ताके काज न अटके कबहूँ, सहज समाधि होय ॥
द्वादश अँगुल स्वांस जो निकसे, ताहि उलटि घट माहीं लावे ।
सोहं सबद की डोर पकड़कर, अधर सिंहासन बैठे जावे ॥
ॐ सोहं की संधि बिचारे, सोई साधू तत्त्व निहारे ।
अक्षर अतीत रहे जो भाई, कबीर सोई निज पद पाई ॥
सोहं सबद का मारो बान, थिर कर राखो अपना ध्यान ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, घट ही में प्रगटे भगवान ॥
बिन बाती बिन तेल का, घट में जरै चिराग ।
सोहं धुन में लीन हो, जाग सके तो जाग ॥
सोहं सोहं जप मुआ, मिटा न मन का भर्म ।
सोहं जब घट में मिले, तब छूटे सब कर्म ॥
उरध मूल अंतर की बानी, सोहं पद की संधि पहचानी ।
ॐकार ध्वनि गगन समाई, तब कबीर निज थिरता पाई ॥
ॐ सोहं दोय एक है, मत कोई मानो दोय ।
सांस की डोरी एक है, पवन थिरक्का होय ॥
कबीर स्वांसा पारखी, सोहं हीरा हाथ ।
ॐकार की परकच में, राखो अपने साथ ॥
सोहं सोहं पवन तपे, मन का बर्फ पिघलाय ।
ॐ की धारा बही, तब कबीर समाइ ॥
कबीर जपनी जपि मुआ, सोहं की गई आस ।
अब तो मन थिर भया, ॐकार के पास ॥
सोहं सोहं बाण चले, छूटे मन का बंध ।
ॐकार की ओट में, प्रगटे निरमल गंध ॥
स्वांस स्वांस में सोहं रमै, घट ही में समंदर होय ।
ॐ की लहरें उठै जहाँ, कबीरा डूबा सोय ॥
सोहं की डोरी पकड़, मन की पतंग उड़ाए ।
ॐकार के खम्भे से, कबीर डोर लगाए ॥
काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥
काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥
जपते जपते सोहं गया, मिटा ॐ का नाद ।
कहै कबीर कछु ना रहा, केवल रहा अगाध ॥
बाहर खोजे मूल न पावे, भीतर सोहं आप समावे ।
ॐकार की ज्योति जो जागे, भ्रमता मनुआ थिर हो जावे ॥
सोहं सोहं साबुन करले, मन का मैल बहाए ।
ॐकार के निर्मल जल में, कबीर शीश नवाए ॥
बिन धागे का बुना चदरिया, सोहं सूत पिरोया ।
ॐकार की सुई से भाई, कबीर ने दुःख सब रोया ॥
सोहं की ओट पकड़ कर बैठो, बाहर के पट बंद करो ।
ॐकार की धुन सुनो घट में, जनम मरण का भय हरो ॥
सोहं थका और ॐ भी छूटा, अब मनुआ आराम पाया ।
कहै कबीर अब कछु न कहना, सहज में सहज समाया ॥
सोहं सोहं जोत जगावे, मन का अंधियारा मिट जावे ।
ॐकार की चमक जहाँ है, काल दुआर ना आवन पावे ॥
उलटि पवन जब सोहं लावे, तब मन गगन गुफा में जावे ।
ॐकार का अमृत बरसे, त्रिवेणी पर शीश नवावे ॥
मनुआ डोले जग के झोंके, सोहं की कील से ताहि रोके ।
ॐकार का डाँडा पकड़ के, भवसागर को पार कर सोके ॥
जब लग सोहं सोहं भासे, तब लग जीव भाव परकाशे ।
ॐ में जब सोहं मिल जावे, तब कबीर अविगत पद पावे ॥
सोहं छूटा ॐ बिलाना, अब तो मन भया दीवाना ।
कहै कबीर कछु कहूँ न भाई, सहज समाधि में मन समाना ॥
सोहं सोहं पवन तपावे, काया कंचन रूप बनावे ।
ॐकार की भट्टी अंतर, कबीर दुर्मति सब जरावै ॥
सोहं की खिड़की खुली घट में, अंतर की ज्योति देख भाई ।
ॐकार का परदा हटा जब, कबीर निज रूप पाई ॥
इँगला पिंगला डोरी छोड़ो, सोहं सूत पकड़ मन लाई ।
ॐकार के मध्य समाना, तब कबीर मुक्ति पाई ॥
सोहं सबद की झाड़ू लेकर, मन का कूडा सब बुहारे ।
ॐकार के आँगन में बैठो, तब कबीर काज सँवारे ॥
सोहं सोहं कहता मन थक गया, ॐ का नाद भी लीन भया ।
कहै कबीर अब कछु न सूझे, सागर में बूँद समाई गया ॥
सोहं सोहं स्वाँसा चले, ज्ञान की भट्ठी होय ।
ॐकार की आँच में, मैल रहा न कोइ ॥
सोहं सबद कमान है, मनुआ भयो नीसान ।
ॐकार का तीर जब छूटे, प्रगटे ब्रह्म गियान ॥
उल्टा कुआँ गगन में, सोहं पानी लाय ।
ॐकार के घाट पर, कबीरा तृषा बुझाय ॥
जब लग सोहं बिलग है, तब लग दुःख का मूल ।
ॐ में जब सोहं मिला, कबीर भयो समतुल ॥
सोहं सोहं कह मुआ, छूटा ॐ का शोर ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, थिर भया मनवा मोर ॥
सोहं सोहं जप करै, मन का कपाट खुल जाय ।
ॐकार की ओट में, कबीर सहज समाय ॥
सुषमन तार पुकारिया, सोहं राग सुनाय ।
ॐकार के मध्य में, मनुआ थिर हो जाय ॥
ताना बाना सोहं का, ॐकार का सूत ।
कबीर बुने चदरिया, अविनाशी अवधूत ॥
सोहं की डोरी पकड़, काल का पहिया रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥
सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब क्या कहूँ, कौन रहा अब कौन ॥
सोहं सोहं पवन थिर, मनुआँ भया उदास ।
ॐकार की ओट में, कबीर लीन्हा निवास ॥
सोहं सबद प्रकाशिया, घट ही में परगास ।
ॐ की धुन जब सुनै, तब मिटै करम का पास ॥
इँगला पिंगला छाँड़ि दे, सोहं सूत पिरोय ।
ॐकार के संधि बिच, सहज समाधि होय ॥
सोहं की डोरी पकड़, अंतर मुख हो बैठ ।
ॐकार के द्वार पर, काल सके ना पैठ ॥
सोहं कहता मन थका, ॐ भया खामोश ।
कहै कबीर कछु ना रहा, मिटा द्वैत का दोष ॥
सोहं सोहं पवन मिलै, मनुआँ गगन समाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर अचल होय जाय ॥
सोहं सबद की धार से, अंतर मैल बहाए ।
ॐकार के ध्यान में, मन निरमल हो जाए ॥
उलटि पवन जब सोहं गहे, सुषमन मार्ग खोल ।
ॐकार की धुन सुनै, तब मनुआं जाई डोल ॥
सोहं की कील गाड़ दे, मन की चंचलता रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥
सोहं छूटा और ॐ भी, रहा न कोई नाद ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, केवल रहा अगाध ॥
चंदा सूरज एक घर आवे, सोहं सबद लौ लाय ।
ॐकार की डोरी पकड़, कबीर समाधि पाय ॥
सोहं सोहं धुन सुनै, घट ही में परगास ।
ॐ की ज्योति जो जगी, मिटा करम का पास ॥
इँगला पिंगला छाँड़ि के, त्रिवेणी पर आओ ।
सोहं-ॐ की संधि में, निज घर खोजो जाओ ॥
बिन बाती बिन तेल का, जरै चिराग अकास ।
सोहं धुन में लीन हो, पूरण भयो परकास ॥
सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया लीन ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, जल में जल ज्यों मीन ॥
सोहं सोहं पवन तपै, अंतर की भट्टी जाइ ।
ॐकार की आँच में, दुर्मति सब जरि जाइ ॥
उलटि पवन जब सोहं गहे, गगन गुफा में धाय ।
ॐकार का घट भरै, कबीर अनत न जाय ॥
सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ॐकार के खम्भे से, सहज समाधि होय ॥
सोहं की डोरी पकड़, काल का पहिया रोक ।
ॐकार के देश में, कबीर पाया लोक ॥
सोहं कहता मन थका, ॐ भी भया खामोश ।
कहै कबीर कछु ना रहा, मिटा द्वैत का दोष ॥
सोहं सोहं पवन मिलै, मन का संशय जाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर अचल होय जाय ॥
सोहं सबद की धार से, अंतर कूडा सब धोय ।
ॐकार के ध्यान में, मन निर्मल अति होय ॥
इँगला पिंगला छाँड़ि के, सुषमन मार्ग समाइ ।
सोहं-ॐ की डोर से, कबीर निज घर जाइ ॥
सोहं की कील गाड़ दे, मन की चंचलता मेट ।
ॐकार के देश में, तब पावे सतगुरु भेंट ॥
सोहं सोहं मिट गया, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, कौन रहा अब कौन ॥
तन धरनी मन तार कर, सुमति करो तबलाउ ।
सोहं-ॐ सबद बजावते, जियत न कबहूँ जाऊ ॥
कबीर स्वांसा पारखी, सोहं हीरा हाथ ।
ॐकार की परख में, राखो अपने साथ ॥
सोहं की सुई पिरोय कर, मन को सीवे जोय ।
ॐकार के मध्य में, सहज समाधि होय ॥
सोहं सोहं पवन तपे, मन का बर्फ पिघलाय ।
ॐ की धारा बही, तब कबीर समाइ ॥
सोहं सोहं बाण चले, छूटे मन का बंध ।
ॐकार की ओट में, प्रगटे निरमल गंध ॥
स्वांस स्वांस में सोहं रमै, घट ही में समंदर होय ।
ॐ की लहरें उठै जहाँ, कबीरा डूबा सोय ॥
सोहं की डोरी पकड़, मन की पतंग उड़ाए ।
ॐकार के खम्भे से, कबीर डोर लगाए ॥
काया नगर का ताला भारी, सोहं कुंजी पावे ।
ॐकार का जाप जपे जब, घट का पट खुल जावे ॥
द्वादश अँगुल स्वांस जो निकसे, ताहि उलटि घट माहीं लावे ।
सोहं सबद की डोर पकड़कर, अधर सिंहासन बैठे जावे ॥
ॐ सोहं की संधि बिचारे, सोई साधू तत्त्व निहारे ।
अक्षर अतीत रहे जो भाई, कबीर सोई निज पद पाई ॥
सोहं सबद का मारो बान, थिर कर राखो अपना ध्यान ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, घट ही में प्रगटे भगवान ॥
बिन बाती बिन तेल का, घट में जरै चिराग ।
सोहं धुन में लीन हो, जाग सके तो जाग ॥
सोहं सोहं जप मुआ, मिटा न मन का भर्म ।
सोहं जब घट में मिले, तब छूटे सब कर्म ॥
अरध उरध की संधि बिचारे, सोहं पद की डोर सँभारे ।
ॐकार ध्वनि गगन समाई, तब कबीर निज थिरता पाई ॥
एक स्वांसा जो व्यर्थ जाये, चौदह लोक का राज जाये ।
सोहं धुन में लीन रहो, ॐकार संग प्रीत जगाये ॥
ओहम से काया बनी, सोहम से मन होय ।
ओहम सोहम से परे, बूझे विरला कोय ॥
सोहं हंसा जपु बिन माला । तहिं रचिआ जहिं केवल बाला ॥
सोहं शब्दु सदा धुनि गाजै । जागतु सोवै नित शब्दु बिराजै ॥
ॐ सोहं मंतर जपिये, योगयुगति धूनी तपिये ।
श्वांस के सुमिरन से भाई, कबीर परम पद पाई ॥
ॐ मन्त्र से ऋण उतारना, सोहं संग सार समाना ।
ऊँ-सोहं भजो नर लोई, आवागमन मिटाना ॥
ओहम सोहम अरध उरध नहीं, स्वासा लेख न कोइ ।
कहै कबीर मन थिर भया, जहाँ पुरुष आपै सोइ ॥
ओहम सोहम एकै कीन्हा, दसवाँ द्वार पट खोलि दीन्हा ।
पाँच सबद धुनि गगन गम्भीरा, तब मन थिर भया कबीरा ॥
सोहं जाप जपो रे हंसा, बिन जिभ्या बिन ताल ।
ॐकार की ओट में बैठो, काल न खावै काल ॥
बिन सूत के ताना बाना, सोहं ओहम तहाँ समाना ।
कहै कबीर धुनि सहज सहेली, जोति जगे घट अंतर अकेली ॥
सोहं सोहं पवन चलावे, मन का संशय दूर बहावे ।
ॐकार की धार में भाई, मेटो जग की भरम कमाई ॥
सोहं छूटा ओहम भी अब नाहीं, केवल रहा समाध घट माहीं ।
कहै कबीर अब कछू न सूझे, निज पद मिलि गया आपहि माहीं ॥
सोहं पुरुष ॐ है माया, दोउ मिलि एकै खेल रचाया ।
श्वांस की डोरी सुरत लगावे, सो जन अमर लोक को जावे ॥
सोहं सोहं पवन घिसावै, अनल प्रगट घट अंतर आवै ।
ॐकार की भट्टी तपै जब, जुग की तृष्णा सब जरि जावै ॥
सोहं सूत ॐ की सुई, मन का कपड़ा सीवे सोई ।
सांस सांस में सुमिरन राखे, ताको काल कबहूँ ना टोई ॥
उलटि पवन सोहं सँग जागे, त्रिवेणी के संगम लागे ।
ॐकार की धुन सुनि भाई, घट में कोटि भान दरसाई ॥
सोहं सोहं मथनी मथे, प्रगटे निर्मल जोत ।
ॐकार की ओट में, अविनाशी पद होत ॥
बाहर जाता पवन जो, सोहं डोरि सँवारि ।
ॐकार के महल में, राखो ताहि सम्हारि ॥
कथनी कथि कथि जग मुआ, सोहं बूझे न कोइ ।
ॐकार के मध्य में, जाकी सुरत समाइ ॥
उलटी गंगा गगन को, सोहं पवन ले जाय ।
ॐकार के घाट पर, मनवा थिर होय जाय ॥
सोहं की सीमा मिटी, ॐ भया बेनाम ।
कहै कबीर अब कछु नहीं, पाया पूरण विश्राम ॥
सोहं गंगा ॐ जमुना, घट ही में संगम होय ।
सुरत शब्द जहाँ मिलै, बहुरि न मन्मथ कोय ॥
सोहं सोहं स्वाँस चले, धोवे मन का मैल ।
ॐकार की ज्योति में, खेलै अचल खेल ॥
इँगला पिंगला डोरी तजो, सोहं सूत मँझारि ।
ॐकार के मध्य में, बैठो सुरत सँवारि ॥
सोहं की कील गाड़ दे, मन की दौड़ मिटाय ।
ॐकार के देश में, कबीर सहज समाय ॥
सोहं सोहं पवन घिसै, मन का पत्थर टूटी जाय ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर सहजैं जाय समाय ॥
सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ।
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥
धागा सोहं नाम का, ॐकार की सुई सम्हारि ।
कबीर मनुआं सीवि ले, भव का भरम निवारि ॥
उलटा कुआँ गगन में, सोहं रस्सी लाय ।
ॐकार के घाट पर, जनम की प्यास बुझाय ॥
सोहं मिटा अरु ॐ गया, रहा न कोई नाद ।
कहै कबीर अब शांत भया, पाया पद अगाध ॥
सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ।
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥
ॐ सोहम की बाजी, खाली बढ़या फलिता ।
जो नर ध्यान लगाए, सदा रहे नसत्ता ॥
ॐ सोहं अधाध-उधाध नहीं, स्वासा लेख न कोइ ।
जहाँ पुरुष तहवाँ कछु नाहीं, कहै कबीर हम जाना ॥
सोहं सबदु सदा धुनि गाजै, जागतु सोवै नित सबदु बिराजै ।
अबरन वरन धाम नहीं छाम, सुन सहज महि रहिओ समाइ ॥
सोहं सो जा कउ है जाप, धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ।
जोति मन्त्र मनि असथिरु करै, कहि कबीर सो प्रानी तरै ॥
सोहं बाएँ ॐ दहिने, सुरत बीच ठहराय ।
अचल गगन में जो मिले, आवागमन नसाय ॥
ॐ सोहं नाम न रूप है, अजपा मूल विचार ।
कहै कबीर मन थिर भया, पाया अगम अपार ॥
सोहं सोहं मथनी मथे, सुषमन धार निचोड़ ।
ॐकार की ज्योति में, कबीर बंध सब तोर ॥
सोहं प्याला प्रेम का, ॐकार रस होय ।
घट ही में अमृत पिए, मरे न कबहूँ कोय ॥
सोहं की डोरी छूटी, ॐकार भया मौन ।
कहै कबीर अब शांत भया, जानन हारा कौन ॥
मन मधे जानै जे कोइ, जो बोलै सो आपै होइ ।
जोति मन्त्र मनि असथिरु करै, कहि कबीर सो प्रानी तरै ॥
द्वादश पन्थ चलो सो भेद, काल फुरमाना जीव न जाय ठिकाना ।
नीर पवन को संधि बतावै, सो ब्रह्म अभिमानी जाणी ॥
सोहं सो जा कउ है जाप, धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप ।
अबरन वरन धाम नहीं छाम, अवरन पाइऔ गुरु का साम ॥
टारी न टरै आवै न जाइ, सुन सहज महि रहिओ समाइ ।
सोहं की डोरी पकड़, बाहर के पट बंद करि ॥
ॐकार के भवन में, सुरत अचल अब धरि ॥
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