इक्कीस हजार छह सौ श्वांसा, निस-दिन चलत प्रकाशा।
उलटि पवन सुखमन में लावे, अजपा उलटि ब्रह्म पद पावे॥
सोहंग श्वांसा भंवर गुफा में, ओंकार त्रिकुटी में जान।
दोई अक्षर मिलि करत पसारा, याही में अटके ऋषि-मुनि ज्ञान॥
सोहंग लोक पार जब जाई, तब सतलोक की झांकी पाई।
सोहंग तक जो सुरति समाई, सो तो काल मण्डल के मांही॥
स्वांसा छूटे, पवन ठहरावे, तब अनहद की धुन बाजे।
अविगत से जब सुरति मिलावे, तब सार शब्द मन गाजे॥
सार शब्द ऐसा आहि, जैसे चुम्बक लोहा खाहि।
सुरति को खैंचि लोक पहुँचावै, बहुरि न भवसागर में आवै॥
सोहंग कहे सो हम हैं भाई, यह तो अहं की बात लखाई।
जब लग 'हम' और 'सो' का फेरा, तब लग मिटै न भव का डेरा॥
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