Wednesday, 26 August 2026

कर नैनों दीदार महलमें प्यारा है

कर नैनों दीदार महलमें प्यारा है।।टेक।।

 काम क्रोध मद लोभ बिसारो, शील सँतोष क्षमा सत धारो।
 मद मांस मिथ्या तजि डारो, हो ज्ञान घोडै असवार, भरम से न्यारा है।1।

 धोती नेती बस्ती पाओ, आसन पदम जुगतसे लाओ। 
कुम्भक कर रेचक करवाओ, पहिले मूल सुधार कारज हो सारा है।2। 

मूल कँवल दल चतूर बखानो, किलियम जाप लाल रंग मानो।
 देव गनेश तहँ रोपा थानो, रिद्धि सिद्धि चँवर ढुलारा है।3। 

स्वाद चक्र षटदल विस्तारो, ब्रह्म सावित्री रूप निहारो। 
उलटि नागिनी का सिर मारो, तहाँ शब्द ओंकारा है।।4।। 

नाभी अष्ट कमल दल साजा, सेत सिंहासन बिष्णु बिराजा। 
हरियम् जाप तासु मुख गाजा, लछमी शिव आधारा है।।5।।

 द्वादश कमल हृदयेके माहीं, जंग गौर शिव ध्यान लगाई। 
सोहं शब्द तहाँ धुन छाई, गन करै जैजैकारा है।।6।। 
षोड्श कमल कंठ के माहीं, तेही मध बसे अविद्या बाई।
 हरि हर ब्रह्म चँवर ढुराई, जहँ श्रीयम् नाम उचारा है।।7।। 

तापर कंज कमल है भाई, बग भौंरा दुइ रूप लखाई। 
निज मन करत वहाँ ठकुराई, सो नैनन पिछवारा है।।8।। 
कमलन भेद किया निर्वारा, यह सब रचना पिंड मँझारा।
 सतसँग कर सतगुरु शिर धारा, वह सतनाम उचारा है।।9।।

 आँख कान मुख बन्द कराओ, अनहद झिंगा शब्द सुनाओ। 
दोनों तिल इक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है।।10।। 

चंद सूर एक घर लाओ, सुषमन सेती ध्यान लगाओ।
 तिरबेनीके संधि समाओ, भौर उतर चल पारा है।।11।। 

घंटा शंख सुनो धुन दोई, सहस्र कमल दल जगमग होई।
 ता मध करता निरखो सोई, बंकनाल धस पारा है।।12।।

 डाकिनी शाकनी बहु किलकारे, जम किंकर धर्म दूत हकारे।
 सत्तनाम सुन भागे सारें, जब सतगुरु नाम उचारा है।।13।। 

गगन मँडल बिच उर्धमुख कुइया, गुरुमुख साधू भर भर पीया।
 निगुरो प्यास मरे बिन कीया, जाके हिये अँधियारा है।।14।।

 त्रिकुटी महलमें विद्या सारा, धनहर गरजे बजे नगारा।
 लाल बरन सूरज उजियारा, चतूर दलकमल मंझार शब्द ओंकारा है।15। 

साध सोई जिन यह गढ लीनहा, नौ दरवाजे परगट चीन्हा।
 दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा, जहाँ कुलुफ रहा मारा है।।16।।

 आगे सेत सुन्न है भाई, मानसरोवर पैठि अन्हाई।
 हंसन मिलि हंसा होई जाई, मिलै जो अमी अहारा है।।17।।

 किंगरी सारंग बजै सितारा, क्षर ब्रह्म सुन्न दरबारा। 
द्वादस भानु हंस उँजियारा, षट दल कमल मँझार शब्द ररंकारा है।।18।। 

महा सुन्न सिंध बिषमी घाटी, बिन सतगुरु पावै नहिं बाटी। 
व्याघर सिहं सरप बहु काटी, तहँ सहज अचिंत पसारा है।।19।।

 अष्ट दल कमल पारब्रह्म भाई, दहिने द्वादश अंचित रहाई।
 बायें दस दल सहज समाई, यो कमलन निरवारा है।।20।। 

पाँच ब्रह्म पांचों अँड बीनो, पाँच ब्रह्म निःअच्छर चीन्हों। 
चार मुकाम गुप्त तहँ कीन्हो, जा मध बंदीवान पुरुष दरबारा है।। 21।। 

दो पर्वतके संध निहारो, भँवर गुफा तहां संत पुकारो। 
हंसा करते केल अपारो, तहाँ गुरन दर्बारा है।।22।। 

सहस अठासी दीप रचाये, हीरे पन्ने महल जड़ाये। 
मुरली बजत अखंड सदा ये, तँह सोहं झनकारा है।।23।।

 सोहं हद तजी जब भाई, सत्तलोककी हद पुनि आई। 
उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है।।24।। 

षोडस भानु हंसको रूपा, बीना सत धुन बजै अनूपा। 
हंसा करत चँवर शिर भूपा, सत्त पुरुष दर्बारा है।।25।। 

कोटिन भानु उदय जो होई, एते ही पुनि चंद्र लखोई। 
पुरुष रोम सम एक न होई, ऐसा पुरुष दिदारा है।।26।। 

आगे अलख लोक है भाई, अलख पुरुषकी तहँ ठकुराई। 
अरबन सूर रोम सम नाहीं, ऐसा अलख निहारा है।।27।।

 ता पर अगम महल इक साजा, अगम पुरुष ताहिको राजा। 
खरबन सूर रोम इक लाजा, ऐसा अगम अपारा है।।28।।

 ता पर अकह लोक है भाई, पुरुष अनामि तहां रहाई।
 जो पहुँचा जानेगा वाही, कहन सुनन ते न्यारा है।।29।। 

काया भेद किया निरुवारा, यह सब रचना पिंड मँझारा। 
माया अविगत जाल पसारा, सो कारीगर भारा है।।30।। 

आदि माया कीन्ही चतूराई, झूठी बाजी पिंड दिखाई। 
अवगति रचना रची अँड माहीं, ताका प्रतिबिंब डारा है।।31।। 

शब्द बिहंगम चाल हमारी, कहैं कबीर सतगुरु दई तारी। 
खुले कपाट शब्द झनकारी, पिंड अंडके पार सो देश हमारा है।।32।।

हंस उबारण कारने, सतगुरु जगमे आय

हंस उबारण कारने,
सतगुरु जगमे आय।
काशी मे परगट भये,
नाम कबीर कहाय।।

बिन मुख सोहं सोहं गावै, झिंगुर सुनि सुरत घर आवै

 

  • "बिन मुख सोहं सोहं गावै, झिंगुर सुनि सुरत घर आवै।"
    • Translation: Without using a physical tongue, the soul sings Sohang, Sohang, and listening to the guiding Jhingur, the scattered mind returns safely home.

Jhingur and Sohang - AI

 "झिंगुर घण्टा संख बजावै, सोहं शब्द का दौर चलावै।

अगम दीप एक देख्या भाई, कबीर सहज समाधि लगाई।"


"सोहं शब्द का जाप निरंतर, भीतर बाजे अनहद तुर।

झिंगुर की धुन सुन मन मान्या, मिट गया जग का भरम क्रूर।"


"प्रथम धुन झिंगुर जैसी आवै, दूजी में फिर भेरी गाजै।
सोहं सोहं धुनि घट भीतर, कबीर सुनत सब संशय भाजै।"


"कहैं कबीर सोहं मन माना, तब हम निरंजन पद पहचाना।"


  • "प्रथम नाद झिंगुर सम होई, सोहं शब्द चीन्हे फिर कोई।"
    • Translation: The first inner sound is like the buzzing of a Jhingur; only after crossing it can one recognize the true majesty of the Sohang word.
  • "दूजे घण्टा संख अनूपा, तीजे बाजे सुरत स्वरूपा।"
    • Translation: The second stage brings the distinct tolling of bells and conch shells, preparing the inner listening self (Surat) for the third phase.
  • "झिंगुर की धुनि झनकार सुहाई, घट भीतर सोहं सरसाई।"
    • Translation: The continuous ringing of the Jhingur sound is sweet; it signals that the divine Sohang current is about to saturate the inner body.
  • "नाद निरन्तर बाजे भाई, झिंगुर तज सोहं लौ लाई।"
    • Translation: The music plays continuously inside, brother. Leave behind the initial Jhingur phase and merge your attention into Sohang.
  • "दसवें द्वारे सोहं राजा, जहां झिंगुर तज बाजे बाजा।"
    • Translation: At the Tenth Door (Crown Chakra), King Sohang reigns supreme, and the initial Jhingur notes transform into a grand orchestra.
Dissolving Worldly Illusion (Maya)
  • "जग का भरम मिटे ततकाला, झिंगुर नाद सुने मतवाला।"
    • Translation: The illusions of the physical world vanish instantly when the intoxicated seeker tunes into the subtle, sharp sound of the Jhingur.
  • "सोहं मंत्र सहज मन माना, तब कबीर झिंगुर धुन जाना।"
    • Translation: When the mind easily surrenders to the Sohang truth, it finally understands why the journey started with the humble Jhingur melody.
  • "काम क्रोध की छूटी टोरी, झिंगुर सोहं बांधी डोरी।"
    • Translation: The heavy ropes of anger and lust break cleanly apart the moment the consciousness is tied to the string of Jhingur and Sohang.
  • "भवसागर से तरे सो प्राणी, सोहं झिंगुर जिन्ह मन ठानी।"
    • Translation: That living being safely crosses the terrifying ocean of material existence who anchors their mind to the internal frequencies of Sohang and Jhingur.
The Mystical Sky of Consciousness (Gagan Mandal)
  • "गगन मण्डल में झिंगुर गाजै, सोहं धुन सुन कायर भाजै।"
    • Translation: In the sky of pure consciousness, the Jhingur sound thunders; hearing the fierce, ego-shattering Sohang vibration, the weak-willed run away.
  • "अधर सिंहासन सोहं राजे, झिंगुर घण्टा आगे बाजे।"
    • Translation: On an invisible throne inside, Sohang sits in state, while the Jhingur and bells act as heralds playing before Him.
  • "त्रिकुटी महल में झिंगुर बोले, सोहं शब्द कपाट को खोले।"
    • Translation: Inside the castle of the Third Eye (Trikuti), the Jhingur chirps endlessly, and the key of the Sohang sound unlocks the final spiritual gates.
  • "झिंगुर नाद भयो उजियारा, सोहं शब्द मिल्यो पिउ प्यारा।"
    • Translation: The resonance of the Jhingur fills the inner space with blinding light, and through Sohang, the soul finally meets its beloved Creator.
Complete Union & Self-Realization

  • "बिन मुख सोहं सोहं गावै, झिंगुर सुनि सुरत घर आवै।"
    • Translation: Without using a physical tongue, the soul sings Sohang, Sohang, and listening to the guiding Jhingur, the scattered mind returns safely home.
  • "झिंगुर घण्टा सहज समाई, सोहं देखि कबीर हरषाई।"
    • Translation: The preliminary sounds of the Jhingur and bells merge effortlessly into nothingness, and Kabir rejoices upon seeing the grand expanse of Sohang.
  • "काया भीतर अजब तमाशा, झिंगुर सोहं मिटवे आसा।"
    • Translation: There is a magnificent, strange show happening inside the human body, where Jhingur and Sohang destroy all superficial worldly expectations.
  • "सोहं सोहं जपले भाई, प्रथम भेद झिंगुर से पाई।"
    • Translation: Chant the unuttered Sohang rhythm, oh brother, for its very first foundational secret is hidden in the sound of the Jhingur.
  • "झिंगुर बाजे सोहं जागे, जम के दूत दूर सब भागे।"
    • Translation: When the Jhingur rings out, the supreme Sohang consciousness wakes up, and the messengers of death flee far away.
  • "अनहद बाणी सोहं धारा, झिंगुर से शुरू होए संसारा।"
    • Translation: The boundless speech flows like a great Sohang river, but its cosmic stream begins inside you with the simple sound of a Jhingur.
  • "कहै कबीर सुनो रे सन्तो, झिंगुर सोहं आदि अरु अन्तो।"
    • Translation: Kabir says, listen oh saints: the spiritual path starts with the entry-level Jhingur sound and finishes at the ultimate destination of Sohang.