Wednesday, 6 May 2026
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय।
बिनु जिभ्या बिनु तालुवै, अन्तर सुरत लगाय॥
हन्स सोहं तार कर, सुरति मकरिया पोय।
उतर-उतर फिरि-फिरि चढै, सहजो सुमिरन होय॥
बरत बाँध कर धरन में, कला गगन में खाय।
अर्ध-अर्ध नट ज्यों फिरै, लगै सुन में टकटकी, आसन पद्म लगाय।
नाभि नासिका माहिं करि, सहजो रहे समाय॥
सहज स्वांस तीरथ बहै, सहजो जो कोइ न्हाय।
पाप पुन्य दोनों छुटै, हरि पद पहुँचे जाय॥
हक्कारे उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन।
सहजो अजपा जाप यह, चरन दास कहि दीन॥
सब घट अजपा जाप है, हन्सा सोहं पुर्ष।
सुरत हिये ठहराय के, सहजो या विधि निर्ख॥
सब घट व्यापक राम है, देही नाना भेष।
राव रंक चंडाल घर, "सहजो" दीपक एक॥
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ये भजन संत सहजोबाई द्वारा रचित हैं, जो प्रसिद्ध संत चरणदास जी की शिष्या थीं। इन पंक्तियों में 'अजपा जाप' (बिना प्रयास के चलने वाला मानसिक सिमरण) और योगिक क्रिया के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का गूढ़ मार्ग बताया गया है।
यहाँ इनका सरल और सटीक भावार्थ दिया गया है:
1. सहज सुमिरन की विधि
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय।
बिनु जिभ्या बिनु तालुवै, अन्तर सुरत लगाय॥
अर्थ: सिमरण (ईश्वर का ध्यान) ऐसा होना चाहिए जो बिल्कुल स्वाभाविक और सहज हो, जिसमें कोई दिखावा न हो। इसके लिए न तो जीभ हिलाने की जरूरत है और न ही तालू का प्रयोग करने की। बस अपनी 'सुरत' (चेतना या ध्यान) को अंतर्मन में ईश्वर से जोड़ देना ही सच्चा सिमरण है।
2. सुरत और शब्द का मिलन
हन्स सोहं तार कर, सुरति मकरिया पोय।
उतर-उतर फिरि-फिरि चढै, सहजो सुमिरन होय॥
अर्थ: यहाँ 'हंस' (जीवात्मा) और 'सोहं' (वह ब्रह्म मैं हूँ) के तार की बात की गई है। जैसे मकड़ी अपने ही भीतर से धागा निकालकर जाल बुनती है और उसी पर ऊपर-नीचे आती-जाती है, वैसे ही साधक को अपनी सुरत को 'सोहं' के धागे में पिरोकर सांसों के साथ ऊपर-नीचे (प्राणायाम के माध्यम से) एकाग्र करना चाहिए।
3. योग की कला
बरत बाँध कर धरन में, कला गगन में खाय।
अर्ध-अर्ध नट ज्यों फिरै, लगै सुन में टकटकी, आसन पद्म लगाय।
अर्थ: जैसे कोई नट (रस्सी पर चलने वाला) रस्सी के सहारे हवा में कलाबाजियां दिखाता है, वैसे ही साधक अपने शरीर (धरन) को संयमित कर अपनी चेतना को 'शून्य' (गगन/ब्रह्मरंध्र) में ले जाता है। पद्मासन लगाकर जब ध्यान शून्य में टिक जाता है, तो संसार की सुध-बुध खो जाती है।
4. प्राणायाम और एकाग्रता
नाभि नासिका माहिं करि, सहजो रहे समाय॥
सहज स्वांस तीरथ बहै, सहजो जो कोइ न्हाय।
पाप पुन्य दोनों छुटै, हरि पद पहुँचे जाय॥
अर्थ: जब श्वास नाभि से नासिका के बीच स्थिर हो जाती है, तो वह एक 'सहज तीर्थ' बन जाती है। जो साधक इस आंतरिक श्वास रूपी तीर्थ में स्नान करता है (अर्थात श्वास-श्वास पर ध्यान टिकाता है), वह पाप और पुण्य के चक्र से मुक्त होकर सीधे ईश्वर के पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
5. अजपा जाप का रहस्य
हक्कारे उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन।
सहजो अजपा जाप यह, चरन दास कहि दीन॥
सब घट अजपा जाप है, हन्सा सोहं पुर्ष।
अर्थ: 'हं' कार के साथ श्वास बाहर आती है और 'स' कार के साथ भीतर जाती है—यही 'हंस' या 'सोहं' का जाप है। यह हर प्राणी में स्वतः (बिना जपे) चल रहा है। गुरु चरणदास जी कहते हैं कि जब साधक इस प्राकृतिक जाप को पहचान लेता है, तो उसे समझ आता है कि वह स्वयं उस परम पुरुष का अंश है।
6. सर्वव्यापक परमात्मा
सुरत हिये ठहराय के, सहजो या विधि निर्ख॥
सब घट व्यापक राम है, देही नाना भेष।
राव रंक चंडाल घर, "सहजो" दीपक एक॥
अर्थ: सहजोबाई कहती हैं कि अपने हृदय में ध्यान को स्थिर करके देखो, तो समझ आएगा कि वह राम (परमात्मा) हर शरीर में व्याप्त है। शरीर चाहे राजा का हो, भिखारी का हो या किसी अछूत का—उनके भीतर जलने वाली आत्मा रूपी ज्योति (दीपक) एक ही है। बाहरी भेष अलग हो सकते हैं, पर तत्व एक ही है।
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Kabir showing path to Dasam Dwar
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| ਰਵਿ ਊਪਰਿ ਗਹਿ ਰਾਖਿਆ ਚੰਦੁ ॥ रवि ऊपरि गहि राखिआ चंदु ॥ Rav oopar gėh raakʰi▫aa chanḋ. I have firmly placed the moon above the sun. |
| ਪਛਮ ਦੁਆਰੈ ਸੂਰਜੁ ਤਪੈ ॥ पछम दुआरै सूरजु तपै ॥ Pachʰam ḋu▫aaræ sooraj ṫapæ. The sun blazes forth at the western gate. |
| ਮੇਰ ਡੰਡ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਬਸੈ ॥੨॥ मेर डंड सिर ऊपरि बसै ॥२॥ Mér dand sir oopar basæ. ||2|| Through the central channel of the Shushmanaa, it rises up above my head. ||2|| |
| ਪਸਚਮ ਦੁਆਰੇ ਕੀ ਸਿਲ ਓੜ ॥ पसचम दुआरे की सिल ओड़ ॥ Pascham ḋu▫aaré kee sil oṛ. There is a stone at that western gate, |
| ਤਿਹ ਸਿਲ ਊਪਰਿ ਖਿੜਕੀ ਅਉਰ ॥ तिह सिल ऊपरि खिड़की अउर ॥ Ṫih sil oopar kʰiṛkee a▫or. and above that stone, is another window. |
| ਖਿੜਕੀ ਊਪਰਿ ਦਸਵਾ ਦੁਆਰੁ ॥ खिड़की ऊपरि दसवा दुआरु ॥ Kʰiṛkee oopar ḋasvaa ḋu▫aar. Above that window is the Tenth Gate. |
| ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥੩॥੨॥੧੦॥ कहि कबीर ता का अंतु न पारु ॥३॥२॥१०॥ Kahi Kabeer ṫaa kaa anṫ na paar. ||3||2||10|| Says Kabir, it has no end or limitation. ||3||2||10|| |