Tuesday, 1 April 2025

बलख और बिलायत लग, हम ही धारें भेष

गरीब, खुरासान काबुल किला,
बगदाद बनारस एक ।
बलख और बिलायत लग,
हम ही धारें भेष Il

Monday, 31 March 2025

Mirabai, Ravidas aur Kabir

सन 1516 की बात सुनो, मीरा ने भक्ति करी भारी।
बीस वर्ष की उमर मे, मीरा पर विपदा पड़ी भारी।।

मीरा को राणा ने त्रास दई, घर छोड़ के बाई चाल पड़ी।
बंधन तोड़ मोह माया के, गिरधर को ढूंढन चाल पड़ी।।

चलते चलते दिन बीते, मीरा ऐक सतसंग मे पहुंच गई।
जहां फरमा उपदेश रहे, रविदास कबीर से भेंट हुई।।

मीरा ने प्रणाम किया, और प्रश्न पूछा सब संतों से।
गिरधर के दर्शन नहीं हुऐ, क्या भूल हुई मेरी भक्ति मे।।

सत्गुरु बोले तेरी भक्ति की, महिमा यह जग जानेगा।
गिरधर प्रेम भाव, यह सारा जग पहचानेगा।।

मीरा बोली वडभाग मेरे, सत्गुरु जी दर्श भऐ थारे।
थारी शरन गहूं कुछ ज्ञान देउ, गिरधर न मिले हमको महारे।।

साहिब कबीर मुसकाते हैं, रविदास को बेटी तुम गुरु करो।
दीक्षा नाम की करो धारण, निस दिन प्रभु नाम का जाप करो।।

रविदास कहे तुम सत्गुरु हो, देते क्यों तुम ही नाम नहीं।
मेवाड़ से मीरा ने आके, इक तुमरी शरण गही।।

गुरु बिना कोई भेद न पावे, न हरी की पावे निशानी।
रविदास कबीरा ऐक भऐ हैं, कोई न सके पिछानी।।

मारग दर्षण कौन करेगा, समय रहा है कम मेरा।
चलने का अब ख्याल है अपना, यहां चार दिनों का है डेरा।।

मीरा जैसी शिष्य नहीं, गुरु नहीं कोई तुम जैसा।
संसार मे दोनो अमर हो, यशगान रहे जो ऐसा।।

पूजेगा संसार तुमहे, सूरज चांद रहेंगे जब तक।
मीरा के गुरु रविदासा, गूंज रहेगी ये तब तक।।

गुरु रविदास ने नाम दिया, मुख से हरि नाम उच्चारा है।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दूजा न कोई सहारा है।।

कहें गुरुजी सुनियो मीरा, ये मूरत गिरधर नाहीं है।
गिरधर को तूं ढूंढत है, सो तो दिल तेरे माहीं है।।

राम नाम से बंधन टूटे, राम ही सबका आधारा है।
सत्गुरु संत और अवतारा, सबने राम उच्चारा है।।

अपार राम की महिमा, कोई कहन न पाया है।
वेद कुराण खोज न पाए, नेति नेति गुण गाया है।।

बोले कबीर सुनो तुम मीरा, यह इक अकथ कहानी है।
राम ही कबीर कृष्ण रविदासा, राम ही मीरा दीवानी है।।

राम ही सारा खेल रचाया, राम ही खेल खिलाड़ी है।
राम ही वृक्ष फूल फल छाया, राम ही बोवे बाढी है।।

गुरु रविदास कहें मीरा से, राम ही सब मे समाया है।
अपने अनुभव से तुम जानो, गिरधर भी राम बन आया है।।

मीरा ने तब ध्यान धरा, मन मे हरी नाम उच्चारा है।
दीदार हुआ दिल मे प्रभु का, जब राम नाम संभारा है।।

आखें खोली जब मीरा ने, तो साहिब कबीर पिछाणा है।
मीराबाई धन्य हुई, जिन रविदास सत्गुरु जाना है।।

प्रेम उठा सत्गुरु की खातिर, आंख से छलक उठे आंसू।
नमस्कार सत्गुरु को किया, चरणकमल धोऐ जांसू।।

प्रेम मगन हो नाच उठी, गुरु मिले रविदास सई।
दासी के सिर पे हाथ रख, दीदार अलख का करा दिया।।

धन्य भाग मेरे सुनो सखीरी, राम रतन धन पाऐ हैं।
वस्तु अमोलि हमे मिली है, गुरु रविदास बताऐ हैं।।

हे मेरे सत्गुरु सांच कहूं मै, अब मैने राम पिछाना है।
सब के घट मे राम ही बोले, राम ही गिरधर जाना है।।

राम ही कबीर और कबीर कृष्ण हैं, सोई रविदास मे बूठा है।
सांचा ज्ञान यही इक साहिब, बाकी सब कुछ जूठा है।।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, जो मेरे दिल मे आवे है।
और देव को पूजूं नाहीं, अब कुछ मन नहीं भावे है।।

मीरा छोड़ चली प्रतिमा, और इकतारा हाथ लिये।
निर्गुण सर्गुण दोउ से नयारे, गोविंद को धर अपने हिय।।

कहें कबीर सुनो रविदास, तुम धन्य भऐ जो मीरा पाई।
जग सारा वंदन करे तुमहे, राम भक्ति मीरा गाई।।